Top 10 Penny Stocks in 2024 Penny stocks are typically associated with companies that have small market capitalizations, limited liquidity, and higher volatility. It's essential to conduct thorough research and consider consulting with a financial advisor before investing in penny stocks. Additionally, the performance of penny stocks can fluctuate significantly, and what may seem like a promising investment today could become highly volatile or even worthless in the future. That said, I can provide a list of penny stocks that have shown potential in 2024 based on various factors such as market trends, industry performance, and company developments. However, please remember that investing in penny stocks carries inherent risks, and these suggestions should not be considered as financial advice. What are Penny Stocks? Penny stocks, typically defined as stocks trading at a low price per share, often garner attention from investors seeking high-risk, high-reward opportunities. ...
श्रीरामचरितमानस
*सप्तम सोपान*
*उत्तरकाण्ड*
*दोहा सं० ८*
*लंकापति कपीस नल नीला ।*
*जामवंत अंगद सुभसीला ।।१।।*
*हनुमदादि सब बानर बीरा ।*
*धरे मनोहर मनुज सरीरा ।।२।।*
*भरत सनेह सील ब्रत नेमा ।*
*सादर सब बरनहिं अति प्रेमा ।।३।।*
*देखि नगरबासिन्ह कै रीती ।*
*सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती ।।४।।*
अर्थ –लंकापति विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान् और अंगद तथा हनुमान्जी आदि सभी उत्तम स्वभाव वाले वीर वानरों ने मनुष्यों के मनोहर शरीर धारण कर लिये । वे सब भरतजी के प्रेम, सुन्दर, स्वभाव (त्याग के) व्रत और नियमों की अत्यन्त प्रेम से आदरपूर्वक बड़ाई कर रहे हैं और नगरवासियों की (प्रेम, शील और विनय से पूर्ण) रीति देखकर वे सब प्रभु के चरणों में उनके प्रेम की सराहना कर रहे हैं ।
👉 _*'धरे मनोहर मनुज सरीरा'*_ – ये सभी वानर और राक्षस कामरूपी थे, जब जैसा रूप चाहे धारण कर सकते थे । वानर देवता ही थे जो वानररूप से रावणवध-कार्य में सहायता के लिये अवतीर्ण हुए । यथा – _*'बनचर देह धरी छिति माही'*_ अब सभी ने मनुष्य शरीर धर लिया । यह वाल्मीकि एवं अध्यात्म रामायण में भी कहा गया है ।
*कारण* – विभिन्न विद्वानों की राय में –
(१) मनुष्य रूप धारण किया, क्योंकि इसी रूप से पूर्व भी साकेत में थे । रणलीला के लिये वानर बने थे, अब वह कार्य हो गया । अब सदा इसी रूप में रहेंगे । पूर्व जो कहा था कि _*'प्रभु तरुतर कपि डार पर ते किये आपु समान ।'*_ उसका यहाँ उत्तर (साफल्य) है । प्रभु मनुज हैं उन्होंने उनको भी मनुज कर दिया ।
(२) मनुष्य शरीर धारण करने का भाव यह है कि मनुष्य समाज में आये हैं, उनके बीच में उन्हीं के समान रहना चाहिये और अपना रूप यह जानकर त्याग दिया कि राक्षस और वानर-शरीर अथम शरीर है, मंगल-समय के योग्य नहीं है । अवधवासी सभी मनोहर हैं, इसलिये सभी वानरों ने भी ऐसे सुन्दर रूप धारण किये कि देखने वालों के मन को हरण कर ले ।
👉 _*'भरत सनेह सील ब्रत नेमा....'*_ – श्रीभरतजी में अनन्त गुण हैं । परंतु वानरों ने जो गुण प्रत्यक्ष देखें, वे उन्हीं की प्रशंसा कर रहे हैं । स्नेह, शील, व्रत और नेम प्रत्यक्ष देख रहे हैं – व्रत और नियम करने से शरीर सूख गया है । भरतजी का आचरण बड़ा मंगलदायक है, यह समझकर आदर और अतिप्रेम से सराहना करते हैं । भरतजी का प्रभुपद में अति प्रेम होने से ये प्रभु को अति प्रिय हैं । सराहना यह कि हमारा स्नेह इनके आगे तुच्छ है, स्नेह हो तो ऐसा हो । दोहावली में कहा है कि सुग्रीव-विभीषण को भरतजी का प्रेम देख ग्लानि होती थी । भरतजी के प्रेम का तो कोई पता भी नहीं पा सकता, ब्रह्मादिक को ही वह अगम है । अतः वानर सोचते हैं इनके प्रेम की हम क्या कहें, पुरवासियों का प्रेम ही बड़ा अनुपम है ।
*पुनि रघुपति सब सखा बोलाए ।*
*मुनि पद लागहु सकल सिखाए ।।५।।*
*गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे ।*
*इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे ।।६।।*
*ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे ।*
*भए समर सागर कहँ बेरे ।।७।।*
*मम हित लागि जन्म इन्ह हारे ।*
*भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे ।।८।।*
*सुनि प्रभु बचन मगन सब भए ।*
*निमिष निमिष उपजत सुख नए ।।९।।*
अर्थ –फिर श्रीरघुनाथजी ने सब सखाओं को बुलाया और सबको सिखाया कि मुनि के चरणों में लगो । ये गुरु वशिष्ठजी हमारे कुलभर के पूज्य हैं। इन्हीं की कृपा से रण में राक्षस मारे गये हैं । (फिर गुरुजी से कहा –) हे मुनि ! सुनिये । ये सब मेरे सखा हैं । ये संग्राम रूपी समुद्र में मेरे लिये बेड़े (जहाज) के समान हुए । मेरे हित के लिये इन्होंने अपने जन्म तक हार दिये (अपने प्राणों तक को होम कर दिया) ये मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं । प्रभु के वचन सुनकर सब प्रेम और आनन्द में मग्न हो गये । इस प्रकार पल-पल में उन्हें नये-नये सुख उत्पन्न हो रहे हैं ।
👉 _*गुर बसिष्ठ कुलपूज्य हमारे....*_ गुरु वशिष्ठजी एवं परिवार का वानरों को परिचय कराने में सर्वप्रथम गुरु से परिचय करवाया । इनसे परिचय कराते हुए कहा कि ये कुल के प्रारम्भ से ही कुलगुरू हैं । इक्ष्वाकु महाराज के समय से बराबर ये ही गुरु रहते आये हैं । जो रघुवंशियों के सब दुःख दूर होते आये हैं, वे सब इन्हीं के आशीर्वाद से तथा जो-जो मनोरथ सिद्ध हुए वे इन्हीं की पूजा और प्रसन्नता से हुए । इस प्रकार सखाओं को गुरु का गौरव और बड़प्पन बताया । साथ ही वानरों को कहा कि इनको साष्टांग दण्डवत करो क्योंकि वानर नहीं जानते थे कि यहांँ किसको प्रणाम करना चाहिये । जो बात भक्त नहीं जानते, वह प्रभु उनको बता देते हैं ।
👉 _*'ए सब सखा.....'*_ – पहले श्रीरामजी ने सखाओं से मुनि के चरणों में प्रणाम करने को कहा, क्योंकि मुनिवेष तो स्पष्ट था । फिर मुनि का परिचय दिया । जब वानर आदि प्रणाम करने लगे, तो प्रणाम करने की रीति है कि अपने यशस्वी पिता आदि का नाम लेकर और उनसे अपना सम्बन्ध बताकर प्रणाम करें । यह काम उनकी ओर से श्रीरामजी ने स्वयं किया । एक ही शब्द _*'सखा'*_ से समस्त वानर और राक्षसों का परिचय हो गया । उन सब की ओर संकेत करके कहा कि _*'ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे ।'*_ इससे अधिक उत्तम परिचय क्या हो सकता था ! श्रीराम के सखा होने से जितना प्रेम वशिष्ठजी का उन सभी पर होगा उतना उनके पिता का नाम सुनकर कदापि नहीं हो सकता था । अतः सरकार ने अपने से उनका प्यारा बराबरी का सम्बन्ध बताया । [परिचय में दोनों को महान बतलाने के पीछे भावना यह भी है कि जिससे कि वानर मुनि को भक्ति से प्रणाम करें और मुनि कृपादृष्टि करके आशीर्वाद दें ।]
👉 _*'भए समर सागर कहँ बेरे'*_ – ये वचन कर्तव्यतासूचक हैं । नहीं तो श्रीलक्ष्मणजी के द्वारा सुग्रीवजी से कहने पर कि आप मित्र की सहायता करें, उन्होंने कहा कि भला, जिसने सप्तताल वृक्षों को, पर्वत और पृथ्वी को एक बाण से बेध डाला, जिसके धनुष की टंकार से पर्वत सहित पृथ्वी काँप उठती है, उसको सहायक की आवश्यकता है ? कदापि नहीं । वे तो स्वयं अपने तेज से रावण का वध करेंगे, मैं तो केवल साथ रहूंँगा ।
👉 _*भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे'*_ – यहांँ भरतजी से तुलना करने का कारण यह है कि लक्ष्मणजी अभी तक तो वन में साथ रहे हैं, पर वशिष्ठजी के निकट भरतजी बराबर रहे हैं और प्रस्तुत प्रसंग में भरतजी की ही तुलना और चर्चा सर्वोपरि है । वन में हनुमानजी के प्रति कहते हुए _*'तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना'*_ कहा क्योंकि वहांँ लक्ष्मणजी निकट थे, यहाँ भरतजी निकट हैं । भगवान को लक्ष्मण और भरत आत्मीयता के कारण अत्यन्त ही प्यारे हैं, इसीलिये के प्यार के यही पैमाने हैं । भरतजी और लक्ष्मणजी परम भागवत हैं, यह बात तो निसंदेह है ; परन्तु भगवान को अकिंचन भक्त अधिक प्यारे हैं । पशयोनि में होकर वानरों ने श्रीरामजी को भगवान न समझकर भी प्रभु को आत्मसमर्पण कर दिया, यह बहुत बड़ी बात है । इसीलिये ये परम भागवतों से भी अधिक प्यारे हैं । भरत और लक्ष्मण तो ईश्वरकोटि में हैं । इसलिये जब अपने अकिंचन भक्तों पर अपना प्रेम दर्शाते हैं तो परम सत्यता के साथ यह कहना पड़ता है कि मेरे अपने-आप से भी ये अधिक प्यारे हैं, क्योंकि ये जीव हैं और अलग हैं ।
।। दोहा ।।
*कौसल्या के चरनन्हि, पुनि तिन्ह नायउ माथ ।*
*आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह, प्रिय मम जिमि रघुनाथ ।।८(रा)।।*
*सुमन बृष्टि नभ संकुल, भवन चले सुखकंद ।*
*चढ़ी अटारिन्ह देखहिं, नगर नारि नर बृंद ।।८(म)।।*
अर्थ –फिर उन लोगों ने कौसल्याजी के चरणों में मस्तक नवाये । कौसल्याजी ने हर्षित होकर आशीषें दीं (और कहा –) तुम मुझे रघुनाथ के समान प्यारे हो । आनन्दकन्द श्रीरामजी अपने महल को चले, आकाश फूलों की वृष्टि से छा गया । नगर के स्त्री-पुरुषों के समूह अटारियों पर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे हैं ।
Thanks For Reading, Have A Great Days
Comments
Post a Comment