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Top 10 penny stocks in 2024

  Top 10 Penny Stocks in 2024 Penny stocks are typically associated with companies that have small market capitalizations, limited liquidity, and higher volatility. It's essential to conduct thorough research and consider consulting with a financial advisor before investing in penny stocks. Additionally, the performance of penny stocks can fluctuate significantly, and what may seem like a promising investment today could become highly volatile or even worthless in the future. That said, I can provide a list of penny stocks that have shown potential in 2024 based on various factors such as market trends, industry performance, and company developments. However, please remember that investing in penny stocks carries inherent risks, and these suggestions should not be considered as financial advice.  What are Penny Stocks? Penny stocks, typically defined as stocks trading at a low price per share, often garner attention from investors seeking high-risk, high-reward opportunities. ...

शिवपूजन और बिल्वपत्र की महिमा

 शिवपूजन और बिल्वपत्र की महिमा 



त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम्।

त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्।।


अर्थात्–तीन दल वाला, सत्त्व, रज एवं तम:स्वरूप, सूर्य-चन्द्र-अग्नि–त्रिनेत्ररूप और आयुधत्रय स्वरूप तथा तीनों जन्मों के पापों को नष्ट करने वाला बिल्वपत्र मैं भगवान शिव को समर्पित करता हूँ।


बिल्वपत्र (बेलपत्र) से ही शिवपूजन की पूर्णता


मनुष्य जन्म दुर्लभ है, जिसका मुख्य लक्ष्य है मोक्ष की प्राप्ति। इसका मुख्य साधन है ज्ञान जो भगवान शिव की उपासना से प्राप्त होता है। शिवजी की आराधना केवल जल व पत्र-पुष्प से ही हो जाती है। इनमें प्रमुख है बिल्वपत्र।


समुद्र-मंथन से उत्पन्न हलाहल-विष की ज्वाला से दग्ध त्रिलोकी की रक्षा के लिए भूतभावन भगवान शिव ने स्वयं ही उस महागरल का हथेली पर रखकर आचमन कर लिया और नीलकण्ठ कहलाए। उस विष की अग्नि को शांत करने के लिए भगवान शिव पर ठंडी वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं; जैसे–जल, गंगाजल, दूध, बेलपत्र गुलाबजल, आदि। 


इससे भगवान शिव का मस्तक शीतल रहता है। शिवपुराण में कहा गया है कि यदि पूजन में अन्य कोई वस्तु उपलब्ध न हो तो बिल्वपत्र ही समर्पित कर देने चाहिए। शिवजी को बिल्वपत्र अर्पित करने से ही पूजा सफल और सम्पूर्णता को प्राप्त होती है।


भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न करने के लिए बिल्वपत्र के तीनों दलों पर लाल चंदन से या कुंकुम से ‘राम’ लिखकर या ‘ॐ नम: शिवाय’ लिखकर अर्पण करना चाहिए। शिवपूजन में संख्या का बहुत महत्व होता है। अत: विशेष अवसरों पर जैसे शिवरात्रि, श्रावण के सोमवार, प्रदोष आदि को ११, २१, ३१, १०८ या १००८ बिल्वपत्र शिवलिंग पर अर्पित किए जा सकते हैं।


मनोकामनापूर्ति, संकटनाश व सुख-सम्पत्ति के लिए इस मन्त्र के साथ चढ़ाएं बेलपत्र


भालचन्द्र मद भरे चक्ष, शिव कैलास निवास,

भूतनाथ जय उमापति पूरी मो अभिलाष।

शिव समान दाता नहीं, विपति विदारन हार,

लज्जा मेरी राखियो सुख सम्पत्ति दातार।।


भगवान शिव को बिल्वपत्र कई प्रकार के मन्त्र बोलते हुए अर्पित किया जा सकता है–


नमो बिल्मिने च कवचिने च नर्मो वर्मिणे च वरूथिने च ।

नम: श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुभ्याय चाहनन्याय च।।

श्रीसाम्बशिवाय नम:। बिल्वपत्राणि समर्पयामि।

या

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्।

त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्।।

या


ॐ नम: शिवाय इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए शिवलिंग पर बिल्वपत्र समर्पित किए जा सकते हैं। मन्त्र बोलने में असमर्थ हैं तो केवल ‘शिव’ ‘शिव’ कहकर भी बेलपत्र अर्पित कर सकते हैं।


शिवपूजा के लिए बेलपत्र चयन करते समय रखें इन बातों का ध्यान

शिवपूजा में बिल्वपत्र चढ़ाते समय कई बातों का ध्यान रखना चाहिए–


बेलपत्र छिद्ररहित होना चाहिए।


तीन पत्ते वाले, कोमल, अखण्ड बिल्वपत्रों से भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए।


बिल्वपत्र में चक्र व वज्र नहीं होने चाहिए। बिल्वपत्रों में जो सफेद लगा रहता है उसे चक्र कहते हैं और डण्ठल में जो गांठ होती है उसे वज्र कहते है।


बेलपत्र धोकर मिट्टी आदि साफ कर शिवजी पर अर्पित करने चाहिए।


जिन तिथियों में बेलपत्र तोड़ने की मनाही है, उस समय बासी व सूखे बेलपत्र भगवान शिव को अर्पित कर सकते हैं।


बिल्वपत्र सदैव अधोमुख (उल्टा) चढ़ाना चाहिए। इसका चिकना भाग नीचे की तरफ रहना चाहिए।


अमृतोद्भव श्रीवृक्ष महादेव प्रिय: सदा।

गृह्णामि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात्।। (आचारेन्दु)


चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथि को, संक्रान्ति व सोमवार को बेलपत्र नहीं तोड़ने चाहिए। किन्तु बेलपत्र शंकरजी को बहुत प्रिय हैं अत: इन तिथियों में पहले दिन का रखा हुआ बेलपत्र चढ़ाना चाहिए। यदि नए बेलपत्र न मिलें तो चढ़ाए हुए बेलपत्र को ही धोकर बार-बार चढ़ाया जा सकता है।


जिस तरह रुद्राक्ष कई मुखों वाले होते हैं उसी तरह बिल्वपत्र भी कई पत्तियों वाले होते हैं। बिल्वपत्र में जितनी अधिक पत्तियां होती हैं, वह उतना ही अधिक उत्तम माना जाता है। तीन पत्तियों से अधिक पत्ते वाले बेलपत्र अत्यन्त पवित्र माने गये हैं। चार पत्ती वाला बिल्वपत्र ब्रह्मा का रूप माना जाता है। पांच पत्ती वाला बेलपत्र शिवस्वरूप होता है व शिवकृपा से ही कभी-कभी प्राप्त होता है। छह से लेकर इक्कीस पत्तियों वाले बिल्वपत्र मुख्यतः नेपाल में पाए जाते हैं। इनका प्राप्त होना तो अत्यन्त ही दुर्लभ है।


बिल्ववृक्ष साक्षात् शंकररूप है। ब्रह्मा आदि देवता शक्ति प्राप्त करने के लिए बिल्ववृक्ष के नीचे आकर बैठते हैं। आशुतोष शिव को बिल्वपत्र कितना प्रिय है, इसका अनुमान इस कथानक से लगाया जा सकता है–एक व्याध (बहेलिया) शिकार के लिए वन में गया। शिकार कर लौटते समय थकान के कारण एक वृक्ष के नीचे सो गया। जागने पर उसने देखा कि रात्रि के घोर अंधकार के कारण घर लौटना असंभव है, अत: जंगली जानवरों के भय से वह एक वृक्ष के ऊपर जाकर बैठ गया। 


भाग्यवश उसदिन शिवरात्रि थी और जिस वृक्ष पर वह बैठा था, वह बिल्ववृक्ष था जिसकी जड़ में अति प्राचीन शिवलिंग था। सुबह शिकार के लिए जल्दी निकलने के कारण उसने कुछ खाया-पिया नहीं था। इससे उसका स्वाभाविक ही उपवास हो गया। सोने पर सुहागा तब हुआ जब वसन्त की रात्रि में ओस की बूंदों से भीगा एक बिल्वपत्र उसके अंगों से लगकर उस शिवलिंग पर जा गिरा। इससे आशुतोष शिव के तोष का पारावार न रहा। फलत: जीवन भर हिंसक कर्म करने के बावजूद उस व्याध को शिवलोक की प्राप्ति हुई।


बेलपत्रों द्वारा शिवजी का पूजन सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाला और सम्पूर्ण दरिद्रता का नाश करने वाला है। बेलपत्र चढ़ाने का वही फल है जो एक कमलपुष्प चढ़ाने का है। बेलपत्र से बढ़कर शिवजी को प्रसन्न करने वाली दूसरी कोई वस्तु नहीं है।

जो मनुष्य ‘ॐ नम: शिवाय’ इस पंचाक्षर मन्त्र से अखण्ड बेलपत्रों द्वारा भगवान शिव का पूजन करता है, वह इस लोक में ऐश्वर्यवान होकर अंत में शिवलोक को प्राप्त होता है।


बिल्ववृक्ष के दर्शन, स्पर्श और वंदन से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।


अंत समय में मनुष्य के सारे शरीर में  बिल्ववृक्ष के मूल की मिट्टी लगा देने से व्यक्ति परमगति प्राप्त करता है।


कृष्णपक्ष की अष्टमी को अखण्ड बेलपत्रों से भगवान शिव की पूजा करने पर ब्रह्महत्यादि पापों से छुटकारा मिल जाता है।


बेलवृक्ष के नीचे बैठकर जो मनुष्य मंत्रजाप करता है, वह पुरश्चरण का (सवा लाख का) फल प्राप्त करता है और उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।


बिल्ववृक्ष के मूल में जो मनुष्य दीपमालिका जलाता है वह तत्त्वज्ञान से पूर्ण (ज्ञानी) हो जाता है।


बिल्ववृक्ष के मूल में किसी शिवभक्त को भोजन कराने से करोड़ों मनुष्यों को भोजन कराने का फल मिलता है।


लक्ष्म्या: स्तनत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्।

बिल्ववृक्षं  प्रयच्छामि बिल्वपत्रं शिवार्पणम्।।


अर्थात्–बिल्ववृक्ष महालक्ष्मीजी के वक्ष:स्थल से उत्पन्न हुआ और महादेवजी का प्रिय है, मैं एक बिल्वपत्र शिवार्पण करता हूँ।


वृहद् धर्मपुराण में बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति सम्बधी कथा–इसके अनुसार बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति लक्ष्मीजी द्वारा स्तन काटकर चढ़ाने से हुई। लक्ष्मीजी ने भगवान विष्णु को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए शिवजी का घोर आराधन व तप किया। अंत में लक्ष्मीजी ‘ॐ नम: शिवाय’ इस पंचाक्षर मन्त्र से एक सहस्त्र कमलपुष्प द्वारा शिवजी का पूजन कर रहीं थीं तब शिवजी ने उनकी परीक्षा करने के लिए एक कमलपुष्प चुरा लिया। भगवान विष्णु ने जब एक सहस्त्र पुष्पों से शिवजी की अर्चना की थी, उस समय भी भगवान शिवजी ने एक कमल चुरा लिया था–


सहस्त्र कमल पूजा उर धारी,

कीन्ह परीक्षा तबहि पुरारी।

एक कमल प्रभु राखेहु जोई,

कमल नयन पूजन चह सोई।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर,

भए प्रसन्न दीन्ह इच्छित वर।


लक्ष्मीजी ने एक कमलपुष्प कम होने पर अपना बायां वक्ष:स्थल काटकर शिवजी पर चढ़ा दिया क्योंकि स्तन की उपमा कमल से की जाती है। जब लक्ष्मीजी अपना दायां वक्ष:स्थल भी काटने को उद्यत हुईं तब शिवजी प्रकट हो गए और लक्ष्मीजी से बोले–’तुम ऐसा मत करो, तुम समुद्र-तनया हो।’


भगवान शिव आदि शल्यचिकित्सक हैं, उन्होंने गणेशजी को हाथी का और दक्षप्रजापति को बकरे का मुख लगाया था। अत: शिवकृपा से लक्ष्मीजी का बायां स्तन ज्यों-का-त्यों हो गया। शिवजी ने लक्ष्मीजी को वर देते हुए कहा–’समुद्र-तनये ! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। भगवान विष्णु तुम्हारा वरण करेंगे।’ लक्ष्मीजी ने कटे हुए स्तन को पृथ्वी में गाड़ दिया जिससे एक वृक्ष उत्पन्न हुआ। जिसके पत्तों में तीन दल हैं व गोल फल लगता है। बिल्वफल को ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी न पहचान सके। यह वृक्ष व इसका फल ब्रह्माजी की सृष्टि से परे है। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया ‘अक्षय तृतीया’ को बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति हुई।


भगवान शिव ने प्रसन्न होकर लक्ष्मीजी से कहा–’बिल्ववृक्ष तुम्हारी भक्ति का प्रतीक होगा। यह वृक्ष मुझे व लक्ष्मीजी को अत्यन्त प्रिय होगा। हम दोनों की बिल्ववृक्ष से की गयी पूजा मुक्ता, प्रवाल, मूंगा, स्वर्ण, चांदी आदि रत्नों से की गयी पूजा से श्रेष्ठ मानी जाएगी। जैसे गंगाजल मुझको प्रिय है, उसी प्रकार बिल्वपत्र और बिल्वफल द्वारा की गयी मेरी पूजा कमल के समान मुझे प्रिय होगी। बिना बिल्वपत्र के मैं कोई भी वस्तु ग्रहण नहीं करुंगा।’


मणिमुक्त्ता प्रवालैस्तु रत्नैरप्यर्चनंकृतम्।

नगृहणामि बिना देवि बिल्वपत्रैर्वरानने।। (लिंगपुराण)


अग्निपुराण में बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति सम्बधी कथा–महर्षि भृगु की जो धेनु है, वही पृथ्वी पर गौ रूप में प्रकट हुई। उसी के गोबर से बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति हुई। उस बिल्ववृक्ष से ही श्री उत्पन्न हुईं। इसलिए बिल्वफल को श्रीफल भी कहा जाता है। श्रीलक्ष्मीजी की तपस्या के फलस्वरूप बिल्ववृक्ष हुआ।


आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।

तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।६।। (श्रीसूक्त, ऋग्वेद)


हे सूर्य के समान कान्ति वाली मां लक्ष्मी!  वृक्षों में श्रेष्ठ मंगलमय बिना फूल के फल देने वाला बिल्ववृक्ष तुम्हारे ही तप से उत्पन्न हुआ। उस बिल्व वृक्ष के फल हमारे बाहरी और भीतरी (मन व संसार के) दारिद्रय को दूर करें।

 ऐसी जानकारी बार-बार नहीं आती, पढ़ाये और पढ़े, ताकि लोगों को भगवान की जानकारी हो  सके आपका आभार धन्यवाद होगा

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