महान गणितज्ञ -डाॅ वशिष्ठनारायणसिंह
महान गणितज्ञ पद्मश्री स्वर्गीय #डाॅवशिष्ठनारायणसिंह के अभूतपूर्व कृतित्वों एवं प्रेरणादायक संदेशों को वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के मध्य सतत् प्रसारित करने हेतु अति महत्वपूर्ण शैक्षणिक परियोजना #शुक्रिया_वशिष्ठ में पुनः योगदान का अवसर मिला । पिछले वर्ष 20 फरवरी, 2020 को जब पुस्तकालय तथा अध्ययन एवं अध्यापन केन्द्र के उद्घाटन के अवसर पर उद्घाटनकर्ता के रूप में उपस्थित था, तब से ही कल्पित संरचना को निकट भविष्य में ही मूर्त रूप प्राप्त करते हुए देखने की इच्छा मन में थी । तब ही मैंने उज्ज्वल भविष्य हेतु शुभकामनाएं देते हुए सभी संस्थापक सदस्यों को बताया था कि जुड़ाव केवल वहीं तक सीमित नहीं रहेगा तथा उद्देश्यों के निमित्त सकारात्मक योगदान समर्पित करने का प्रयास समय-समय पर करता रहूँगा ।
यह प्रबल इच्छा मन में समाहित थी परंतु उद्घाटन के कुछ समय पश्चात ही कोरोना के प्रभाव में सभी कल्पित शैक्षणिक गतिविधियां कुछ समय तक बाधित हो गईं । धीरे-धीरे समय बीतने के साथ परिस्थितियों में अपेक्षित परिवर्तन हुआ और श्रृंखला को आगे बढ़ाने हेतु स्थापित प्रकल्प द्वारा आवश्यक कार्य किया जाने लगा । कालांतर में इस वर्ष के प्रारंभ में जब यह सूचना मिली कि संपूर्ण बिहार के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से आर्थिक रूप से अभावग्रस्त मेधावी विद्यार्थियों का चयन कर लिया गया है और उनके द्वारा भौतिक रूप में योगदान भी कर दिया गया है, अत्यंत प्रसन्नता हुई । इन विद्यार्थियों से शीघ्र ही मिलने की इच्छा होने लगी थी जो कल (30 जनवरी, 2021) पूर्ण हो सकी जब इनसे विस्तृत वार्ता का अवसर भी मिला जिसमें मैंने सभी की शैक्षणिक पृष्ठभूमि को जानने के पश्चात सफलता के सूत्रों को विस्तारपूर्वक समझाने का प्रयास किया ।
वार्ता के क्रम में त्रिकोण का उदाहरण देकर प्रतिस्पर्धा में सबसे उत्कृष्ट स्थान पर पहुंचने वाले साधकों के लक्षणों की चर्चा करते हुए 3D's अर्थात #Desire (इच्छा), #Dedication (निष्ठा) एवं #Determination (दृढ निश्चय) के क्रमबद्ध महत्व को मैंने समझाया तथा छात्र जीवन से ही मुझे अत्यंत प्रेरित करने वाली निम्नांकित पंक्तियों को मैंने पुनः उद्धृत किया -
"काम शुरू करते नहीं भय से नीचे लोग,
मध्यम त्यजते बीच में देख विषम संयोग I
पर उत्तम वे लोग जो हर दुर्गम पथ झेल,
ढृढ़ता से बढ़ते सतत बाधाओं को ठेल II", जिनका मूल स्रोत भर्तृहरि नीति शतक (श्लोक, 27) ही है -
"प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः
प्रारब्धमुत्तमजना न परित्यजन्ति।।"
अपनी अल्पकालीन जीवनरूपी यात्रा में मैंने यह स्पष्ट देखा है तथा अनुभव भी किया है की वास्तव में लगभग सभी प्रकार के कार्यों का मूल इन्हीं पंक्तियों में समाहित है जिसका अनुकरण करने पर साधक को सफलता अवश्य मिलती है I लक्ष्य जो भी हो उसकी प्राप्ति के लिए आवश्यकता है केवल ऐसे दृढ निश्चय की जो कभी विचलित नहीं हो I कठिन परिश्रम करने पर यदि निश्चय अटूट हो तो अन्य मार्ग अपने आप स्पष्ट हो जाते हैं और लक्ष्य की ओर अग्रसर करते हैं I मानवीय क्षमता के चरमोत्कर्ष की चर्चा करते हुए मैंने उपनिषदों के अत्यंत प्रेरणादायक एवं महत्वपूर्ण श्लोक
"ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वसिष्यते ।।"
को पुनः उद्धृत किया जिसमें यह वर्णन मिलता है कि पूर्ण को खंडित करने पर भी हर खंड पूर्ण ही रहता है और पुनः पूर्ण में ही विलीन हो जाता है; अर्थात् हर आत्मा जो परमात्मा का ही अंशरूप है उसमें उसके सभी गुण समाहित हैं ।
युवा मन में अपने सामर्थ्य के प्रति किसी प्रकार का संदेह न हो इसके लिए यह अनुभूति आवश्यक है कि ईश्वर (पूर्ण) की वह असीम शक्ति सभी के अंदर पूर्णतः समाहित है और सदैव सही मार्गदर्शन हेतु तत्त्पर भी है । ऐसे में कहीं और न देखकर यदि हम एकाग्रचित्त होकर गहन आत्मचिंतन करेंगे तो उपनिषदों में वर्णित महावाक्य "अहम् ब्रह्मास्मि" तथा "तत्त्वमसि" के तात्पर्य को आत्मसात् करते हुए सभी के लिए स्वयं मार्गदर्शक बन जाऐंगे । तात्पर्य को और स्पष्ट करते हुए मैंने आगे कहा कि "ईश्वर ने हर व्यक्ति के #डीएनए को विशेष बनाया है जो सबसे अलग है और समाज में अपना भिन्न योगदान समर्पित करने हेतु निमित्त है । आवश्यकता अपनी क्षमताओं को समझने तथा तदनुसार योजनाबद्ध रूप में निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु सकारात्मक परिश्रम करने की है । कई बार दूसरों के अनुसरण के कारण हम अपने मूल्यों से दिग्भ्रमित हो जाते हैं और विशेषकर ऐसा तब होता है जब हमारा अपनी मूल क्षमताओं से विश्वास डिग जाता है, जो सर्वथा गलत है ।
सफलता के सूत्रों पर वार्ता के पश्चात मैंने संपूर्ण #भारत में तथा विशेषकर बिहार में #गणितअध्ययन की अत्यंत प्राचीन एवं गौरवशाली #ऐतिहासिकपरंपरा का भी स्मरण किया चूंकि आधुनिक गणित एवं विज्ञान के मूलभूत सिद्धांत "#शून्य" की कल्पना कभी इसी भूमि पर महान गणितज्ञों द्वारा की गई थी, जिसमें प्रखर रूप से आज भी हम आचार्य #आर्यभट्ट के प्रति नमन समर्पित करते हैं । मातृभूमि में आदिकाल से स्थापित ऐसी प्राचीन परंपरा के आधुनिक वाहक के रूप में 2, अप्रैल, 1942 को #भोजपुर जिले के वसंतपुर ग्राम में अत्यंत प्रतिभावान वशिष्ठ बाबू का जन्म हुआ जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन गणित के प्रति समर्पित कर अविस्मरणीय योगदान किया । भारत में #वैदिकशुल्बसूत्रों तथा शून्य से प्रारंभ #गणितयात्रा को उन्होंने 1969 में Cycle Vector Space Theory तक पहुंचाया तथा उज्ज्वलतम भविष्य हेतु बीजारोपण कर गए । आवश्यकता इस परंपरा को आगे बढ़ाने की है जिसमें युवाओं की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है ।
ऐसे महान व्यक्तित्व के प्रति वास्तविक श्रद्धांजलि तभी हो सकती है जब प्रेरणा पुंज के रूप में उनके द्वारा स्थापित प्रवाह तीव्र गति से भविष्य में भी गतिमान रहे । ऐसे में "शुक्रिया वशिष्ठ" की स्थापना के पश्चात संस्थान को वास्तविक रूप में विद्यार्थियों के मार्गदर्शक के रूप में आगे बढ़ते देखकर निश्चित ही मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई । मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से यह क्षण अविस्मरणीय रहेगा चूंकि इस अवसर पर स्वर्गीय वशिष्ठ बाबू के भतीजे मुकेश जी द्वारा वशिष्ठ बाबू द्वारा हस्ताक्षरित श्रीमद्भगवद्गीता की उनकी व्यक्तिगत प्रति उपहार स्वरूप मुझे भेंट की गई जिससे अब भौतिक रूप में भी प्रेरणा प्रदत्त करती हुई उनकी पुस्तक सदैव मेरे समीप ही रहेगी । ऐसा अद्भुत उपहार प्राप्त कर #यात्री_मन भावविह्वल हो उठा तथा संस्थान से प्रस्थान के समय सर्वशक्तिमान से यही प्रार्थना करता रहा कि स्वर्गीय वशिष्ठ बाबू की प्रेरणा बिहार के युवाओं का सदैव मार्गदर्शन करती रहे और भारत की ऐतिहासिक ज्ञान परंपरा आगे बढ़ती रहे ।
मित्रों ! ऐसी जानकारी पढ़ाये और पढ़े, ताकि लोगों को जानकारी हो सके
आपका आभार धन्यवाद ह l
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